Wednesday, March 2, 2011

ग़ज़ल : - दाग़ दो चार और पाता हूँ


ग़ज़ल : - दाग़ दो चार और पाता हूँ
याद तेरी में गुनगुनाता हूँ
ज़िंदगी को करीब पाता हूँ |

शीत कहती मुझे तू छू कर देख
और मैं दूब सा शरमाता हूँ |

तुझपे फबते हैं सोलहों श्रृंगार
मैं ही शीशा हूँ बिखर जाता हूँ |

तेरे पहलू में टंका एक गोटा
बदन को छू कर सिहर जाता हूँ |

भांप न ले की चाहता हूँ तुझे
इसी संकोच में घबराता हूँ |

रोज लिखता हूँ पातियाँ दस बीस
और फिर तुझसे मैं छुपाता हूँ |

इश्क पाकीज़ा रूहानी एहसास
दफअतन डूबता उतराता हूँ |

जितना धोता हूँ ये दुनियाबी लिबास
दाग़ दो चार और पाता हूँ |

नूर तेरा अव्वल उपाया है
नासमझ हूँ मैं भूल जाता हूँ |

(निर्गुण ख़याल की ग़ज़ल )

ग़ज़ल:- केंचुल में ज़हरीले लोग


ग़ज़ल:- केंचुल में ज़हरीले लोग 

आकर्षक चमकीले लोग
केंचुल में ज़हरीले लोग |

आत्ममुग्धता की परिणति हैं
सुन्दर सुघड सजीले लोग |

भूख की आंच पे चढ़ते हैं नित
खाली पेट पतीले लोग |

झंझावाती जीवन सागर
हम शंकित रेतीले लोग |

चीर हरण करते आँखों से
कुंठाओं के टीले लोग |

स्वार्थ की धूप में पानी पानी
बे उसूल बर्फीले लोग |

पथरीली चौपाल देश की
चर्चा में पथरीले लोग |

गांव में आकर शहर खा गये
परिश्रमी फुर्तीले लोग |

गिरगिट जैसा रंग बदलते
चापलूस चमचीले लोग |

ज़्यादातर अव्वल आला हैं
अवसरवादी ढीले लोग |

ग़ज़ल :- सच के व्यापार में नफा क्या है



ग़ज़ल :- सच के व्यापार में नफा क्या है
चार पैसा उसे हुआ क्या है
पूछता फिर रहा खुदा क्या है |

हर जगह तो यही करप्शन है
रोग बढ़ता गया दवा क्या है |

तुम ही रक्खो ये नारे वादे सब
पांच वर्षों का झुनझुना क्या है |

तेरे जाने पर अब ये जाना माँ
बद्दुआ क्या है और दुआ क्या है |

हम मलंगों से पूछकर देखो
सच के व्यापार में नफा क्या है |

और बढ़ जाती है व्यथा मेरी
जब कोई पूछता कथा क्या है |

वक्त रुकता कहाँ किसी के लिये
दुश्मनी ही सही जता क्या है |

ज़िंदगी मौत का साया है तू
साथ जितना भी है निभा क्या है |

अब तो मंदिर भी लूटे जाते हैं
याचना से यहाँ मिला क्या है |

Sunday, February 27, 2011

गज़ल : गिनती के अशआर


गज़ल : गिनती के अशआर
झूठ से इसको नफरत सी है सच्चाई को प्यार कहे ,
मेरा दिल तो जब भी बोले दो और दो को चार कहे |

मर खप कर  एक बाप जुटाता बेटी का दहेज ,
लेने वाले की बेशर्मी वो इसको उपहार कहे |

भ्रष्टाचार घोटालों के पहियों पर रेंग रही ,
लानत है उस शख्स पे जो इसको सरकार कहे |

जैसी करनी वैसी भरनी अब नहीं दीखता है ,
हम कैसे इस बात को माने कहने को संसार कहे |

मूंगे मोती मेवे से चाहे  भर दो जितना ,
 सागर से आयी हर मछली जार को जार  कहे |

हमें आईना दिखलाते हैं गिनती के अशआर ,
यूं तो बीते एक दशक में हमने शेर हज़ार कहे |