Sunday, February 27, 2011

गज़ल : गिनती के अशआर


गज़ल : गिनती के अशआर
झूठ से इसको नफरत सी है सच्चाई को प्यार कहे ,
मेरा दिल तो जब भी बोले दो और दो को चार कहे |

मर खप कर  एक बाप जुटाता बेटी का दहेज ,
लेने वाले की बेशर्मी वो इसको उपहार कहे |

भ्रष्टाचार घोटालों के पहियों पर रेंग रही ,
लानत है उस शख्स पे जो इसको सरकार कहे |

जैसी करनी वैसी भरनी अब नहीं दीखता है ,
हम कैसे इस बात को माने कहने को संसार कहे |

मूंगे मोती मेवे से चाहे  भर दो जितना ,
 सागर से आयी हर मछली जार को जार  कहे |

हमें आईना दिखलाते हैं गिनती के अशआर ,
यूं तो बीते एक दशक में हमने शेर हज़ार कहे |

1 comment:

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति !

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